Dr. Subhash C. Kashyap
Former Secretary - General Lok Sabha

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न्यायिक पुनरीक्षण विधि के शासन का अनिवार्य अंग
03 Aug 2010 | Posted By  Dr. Subhash C. Kashyap
ब्रिटिश संसदीय प्रणाली में संसद सर्वोच्च तथा प्रभुत्व संपन्न है। इसकी शक्तियों पर, कम-से-कम सैद्धांतिक रूप में कोई रोक नहीं है, क्योंकि वहां पर कोई लिखित संविधान नहीं है और न्यायपालिका को विधान का न्यायिक पुनरीक्षण करने का कोई अधिकार नहीं है।
अमेरिका की प्रणाली में सुप्रीम कोर्ट सर्वोच्च है क्योंकि उसे पूर्ण न्यायिक पुनरीक्षण तथा संविधान के निर्वचन की शक्ति प्राप्त है। भारत में संविधान ने मध्य मार्ग अपनाया है। उसने ब्रिटिश संसद की संप्रभुता और अमेरिका की न्यायिक सर्वोच्चता के बीच समझौता किया है। हम विधि के शासन से शासित होते हैं और किसी भी प्रशासनिक कृत्य का न्यायिक पुनरीक्षण विधि के शासन का अनिवार्य अंग है। इस प्रकार, अदालतें न केवल विधि की संवैधानिकता का निर्णय कर सकती हैं अपितु प्रशासनिक कृत्यों के प्रक्रियागत भाग का भी [बिहार राज्य बनाम सुभाष सिंह, ए आई आर 1997 एस सी 1390]। किंतु चूंकि हमारा संविधान एक लिखित संविधान है तथा उसमें प्रत्येक अंग की शक्तियों तथा उसके कार्यों की परिभाषा दी गई है तथा सीमा निर्धारित की गई है। इसलिए किसी भी अंग के [यहां तक कि संसद के भी] प्रभुत्व संपन्न होने का कोई प्रश्न नहीं है। संसद तथा सुप्रीम कोर्ट, दोनों अपने-अपने क्षेत्रों में सर्वोच्च हैं। जहां सुप्रीम कोर्ट संसद द्वारा पारित किसी कानून को संविधान का उल्लंघन करने वाला बताकर संसद के अधिकार से बाहर अवैध और अमान्य घोषित कर सकता है। संसद कतिपय प्रतिबंधों के रहते हुए संविधान के अधिकांश भागों में संशोधन कर सकती है।
न्यायिक पुनर्विलोकन का विकास जिस रूप में अमेरिका में हुआ है, उसके अंतर्गत वहां के सुप्रीम कोर्ट को अधिकार है कि वह इस बारे में विधायी कार्य की वैधता या अवैधता के संबंध में अंतिम निर्णय सुना सकता है कि वह कहां तक मूल विधि यानी देश के संविधान के उपबंधों के अनुरूप है। इस संबंध में हमारा संविधान बहुत कुछ [लेकिन पूर्णतया नहीं] अमेरिकी प्रथा का अनुसरण करता है। संविधान देश की मूल विधि है। अत: हर विधायी अधिनियम को, चाहे वह संघ का हो या राज्यों का, इस मूल विधि के अनुरूप होना ही चाहिए। भारत में केवल अपवाद यह है कि जब विधि को असंवैधानिक घोषित कर दिया जाए तो उसके बाद अधिकांश मामलों में संविधान में संशोधन किया जा सकता है ताकि न्यायिक निर्वचन की रक्षा की जा सके और विधि को अनुज्ञेय बनाया जा सके।
प्राय: राज्य सरकार अथवा प्रभावित निजी व्यक्ति अथवा पक्ष सुप्रीम कोर्ट के समक्ष वाद दायर करते हैं और दावा करते हैं कि विधि विशेष को अधिनियमित करते समय संबद्ध सरकार ने सातवीं अनुसूची के अधीन शक्तियों के विभाजन के संबंध में अपनी अधिकारिता की सीमा का उल्लंघन किया है। ऐसे कानून का पुनर्विलोकन करते समय सुप्रीम कोर्ट जांच करेगा कि अधिकारिता की सीमाओं का उल्लंघन हुआ है या नहीं। संविधान में मूल अधिकारों संबंधी अध्याय का समावेश न्यायिक पुनर्विलोकन को विशेष संगतता प्रदान करता है। अनुच्छेद 12 मूल अधिकारों के बारे में यह गारंटी देता है कि राज्य की किसी भी प्रकार की कार्रवाई उनका अपहरण नहीं करेगी और इस अनुच्छेद के अधीन ''राज्य' की परिभाषा इस प्रकार की गई है कि उसमें भारत की सरकार और संसद, राज्यों में से प्रत्येक राज्य की सरकार और विधानमंडल तथा राज्य के राज्य क्षेत्र के भीतर या भारत सरकार के नियंत्रण के अधीन सभी स्थानीय और अन्य प्राधिकारी आ जाते हैं।
अनुच्छेद 13 घोषणा करता है कि मूल अधिकारों से असंगत या उन्हें न्यून करने वाली सभी विधियां उस मात्रा तक शून्य होंगी जिस तक वे असंगत हैं। 1967 तक सुप्रीम कोर्ट भी इस दृष्टिकोण को स्वीकार करता था कि संविधान संशोधन अधिनियम अनुच्छेद 13 [2] की परिभाषा के अधीन 'विधि' नहीं है। लेकिन गोलकनाथ के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बहुमत से निर्णय किया कि इस परिभाषा के अधीन संविधान संशोधन अधिनियम भी 'विधि' है और इसलिए उसका न्यायिक पुनर्विलोकन किया जा सकता है। संविधान [24वां संशोधन] अधिनियम, 1971 द्वारा संविधान में खंड 13 [4] जोड़ा गया। उसमें कहा गया कि संविधान का संशोधन अनुच्छेद 13 [2] की परिभाषा के अधीन 'विधि' नहीं है। केशवानंद भारती के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इस दृष्टिकोण को उचित ठहराया।
मूल अधिकारों संबंधी अध्याय में अनुच्छेद 32 में सुप्रीम कोर्ट को न्यायिक पुनर्विलोकन की शक्ति विशेष रूप में प्रदान की गई है। इस अनुच्छेद के अधीन हर नागरिक को अधिकार है कि वह अध्याय 3 में दिए गए अधिकारों का प्रवर्तन कराने के लिए समुचित कार्रवाई द्वारा सुप्रीम कोर्ट का द्वार खटखटा सके। सुप्रीम कोर्ट अपनी आरंभिक अधिकारिता में याचिका की सुनवाई कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट को यह शक्ति दी गई है कि वह प्रदत्त अधिकारों में से किसी को प्रवर्तित कराने के लिए, ऐसे निर्देश या आदेश या रिट जिनके अंतर्गत बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, अधिकार-पृच्छा और उत्प्रेषण रिट हैं, जो भी समुचित हो जारी कर सके।
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