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जवाबदेही स्वायत्तता का ही पहलू
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विधान में सत्ता के दुरुपयोग को रोकने के लिए जांच और संतुलन स्थापित करने के लिए प्रणालियां होनी ही चाहिए। संविधान सभा के अंतिम सत्र में डा. राजेंद्र प्रसाद ने जो सीख दी थी उसे हमें याद रखना है। उन्होंने कहा था, संविधान में कोई व्यवस्था हो या न हो, देश का कल्याण इस बात पर निर्भर करेगा कि उसका संचालन किस प्रकार से किया जा रहा है और उन व्यक्तियों पर निर्भर करता है जो इसका संचालन करते हैं.... संविधान तो एक मशीन की तरह है जो जीवंत नहीं होती। इसे जीवंत बनाते हैं वे लोग जिनका इस पर नियंत्रण है, और जो इसका संचालन करते हैं और भारत को आज ऐसे ही ईमानदार लोगों की जरूर है जो देशहित को स्वहित पर वरीयता देते हैं। यही पते की बात है। संविधान में इसकी भूमिका की प्रकृति को ध्यान में रखते हुए न्यायपालिका से अपेक्षा वास्तव में अत्यंत उच्च है। न्यायपालिका की स्वायत्तता कानून के संरक्षक के रूप में इसे अधिकार देती है। ऐसा केवल इसके सम्मान के लिए नहीं है, बल्कि यथार्थत: जनता के हित साधने तथा कानून के नियम को सुरक्षित रखने के लिए भी है। न्यायपालिका की जवाबदेही लोकतंत्र के गणराज्य में उसकी स्वायत्तता का ही एक पहलू है। इसलिए, न्यायपालिका संबंधी आचरण के स्थापित प्रतिमान हैं, जिनकी न्यायाधीशों से अपेक्षा की जाती है। एडीसन के शब्दों में- संपूर्ण रूप से न्यायी होना दैवीय प्रकृति का गुण है, अपनी साम‌र्थ्य की भरसक कोशिश तक ऐसा करना मानव का गौरव है। यह न्यायपालिका के कार्य संचालन की प्रकृति का सटीक वर्णन है। इस लक्ष्य को कैसे सुनिश्चित किया जाए, तथा न्यायपालिका की स्वायत्तता के यथार्य प्रयोजन कैसे प्राप्त किया जाए? इलाहाबाद उच्च न्यायालय शताब्दी इतर रजत जयंती स्मारक ग्रंथ हमें प्राचीन ग्रंथों से उद्धरण की याद दिलाते हैं: राजा, न्यायालय के सदस्य के रूप में, प्रमाणित सत्यनिष्ठा वाले सम्मानीय व्यक्ति को ही नियुक्त करें, जो न्याय देने के कार्य में सक्षम हो तथा जो दिव्य विधान में, बुद्धिमता के नियमों में सुनिपुण हो, जो, मित्रों एवं शत्रुओं के प्रति उदार तथा निष्पक्ष हो। हाल ही में, डेविड पन्निक ने अपनी पुस्तक जजिज में निष्कर्ष दिया है: न्यायाधीश के वांछित गुणों को सहजता से बताया जा सकता है, कि वह श्रेष्ठ न्यायाधीश हो तथा कि वह ऐसा दिखाई भी देना चाहिए। ऐसे गुणों को आसानी से अर्जित नहीं किया जाता है। न्यायाधीश के पास अन्याय को समाप्त करने की शक्ति के साथ-साथ ऐसी क्षमता भी आवश्यक है जिसकी एक इतिहासकार तथा एक दार्शनिक तथा एक पैगंबर से मांग की जाती है.. क्योंकि न्यायपालिका की समाज के प्रबंधन में केंद्रीय भूमिका होती है। हमें न्यायाधीश ओलिवर वेंडेल होलम्स के शब्दों में सार्वजनिक जीवन के इस पहलू को निंदक के तेजाब से धो देना चाहिए। न्यायपालिका की स्वायत्तता पर बताए गए सिद्धांत इन पहलुओं को सम्मिलित करने के लिए है। न्यायपालिका की स्वायत्तता पर मंडराने वाले खतरों को रोकने के लिए सभी स्तरों पर नियुक्ति प्रक्रिया तथा जवाबदेही सहित स्वायत्तता को सुनिश्चित करने वाला तंत्र महत्वपूर्ण होता है। इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए संपूर्ण बार बेंच सहित सभी को निष्कपट प्रतिबद्धता तथा संकल्प लेना समय की मांग है। हमें किस बात की आवश्यकता है? न्यायपालिका की आलोचना करना ही पर्याप्त नहीं है। मैं निम्नलिखित सुझाव भी देना चाहूंगा:- ठ्ठ भारत के मुख्य न्यायाधीश, लोकसभा और राज्यसभा में सदन के नेताओं, लोकसभा और राज्यसभा में विपक्ष के नेताओं, संघ के विधि मंत्री तथा राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त कानून के दो विख्यात ज्ञाताओं का पैनल सुप्रीम कोर्ट व हाई कोर्ट के न्यायधीश की नियुक्ति करे। ठ्ठ न्यायधीशों के रूप में नियुक्त किए जाने वाले नामों को, अमेरिका तथा ब्रिटेन की तरह, संबंधित न्यायालय की वेबसाइट पर रखा जाना चाहिए ताकि बाद में कोई यह आरोप नहीं लगा सके कि नियुक्ति पक्षपातपूर्ण तथा गोपनीय थी। ठ्ठ न्यायधीशों के विरूद्ध लगे आरोपों की जांच करने के लिए स्वतंत्र राष्ट्रीय न्यायपालिका परिषद होनी चाहिए। राष्ट्रीय न्यायपालिका परिषद में भारत के मुख्य न्यायाधीश, एक हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, लोकसभा अध्यक्ष, राज्यसभा के सभापति, भारत के एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश तथा राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त दो विख्यात कानूनविद् शामिल होने चाहिए। ठ्ठ सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों को अमेरिका की तरह जीवनभर वेतन मिलना चाहिए तथा उन्हें सेवानिवृत के पश्चात किसी प्रकार के कार्यभार आयोग, जांच आदि देने पर पूर्णतया: रोक होनी चाहिए। हाईकोर्ट के न्यायाधीशों को अंतिम आहरित वेतन के समकक्ष आजीवन पेंशन मिलनी चाहिए तथा उन्हें सेवानिवृति के पश्चात तीन वर्षो की अवधि के लिए किसी प्रकार के कार्यभार आयोग, जांच आदि देने पर रोक होनी चाहिए। इन सुझावों के साथ, मैं पाठकों को धैर्यपूर्ण मेरे विचारों को पढ़ने के लिए धन्यवाद देना चाहता हूं।
 

   
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