वर्ष 1850 के आसपास न्याय की अदालती व्यवस्था में जिला स्तर पर दाण्डिक वाद तीन माह में तथा सिविल वाद एक वर्ष में निपट जाया करते थे। कमोवेश यही स्थिति लगभग अगले एक सौ वर्षो तक चलती रही। वर्ष 1960 में न्यायिक अधिकारी हुए मेरे पिताजी बताते हैं कि उस समय तक भी आमतौर पर दाण्डिक वाद छह माह में तथा सिविल वाद लगभग तीन वर्ष में, जिला स्तर के न्यायालयों पर निपट जाया करते थे। अभी कुछ दिनों पूर्व मेरी अवकाश प्राप्त माननीय न्यायमूर्ति श्री ओम प्रकाश वर्मा (पूर्व राज्यपाल, पंजाब) से मुलाकात हुई। शिक्षा पूर्ण होने के पश्चात उन्होंने अपनी जीविकोपार्जन यात्रा वर्ष 1960 में एक मुंसिफ के रूप में प्रारम्भ की थी। उन्होंने बताया कि वर्ष 1970 तक भी हालात लगभग नियंत्रण में थे। एक वर्ष में दाण्डिक वाद तथा 4-5 वर्ष में सिविल वाद, निपट जाया करते थे। इसके अगले चार दशकों यानी कि वर्ष 1970 से वर्ष 2010 तक मुकदमों की संख्या पर अंकुश एवं उनके निस्तारण के समस्त प्रयास आंशिक प्रारम्भिक सफलता ही दिला सके। मेरे विचार से न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने के साथ उनकी प्रतिबद्धता पर ध्यान देने की अधिक आवश्यकता थी, जो कि सतत प्रयास एवं प्रशिक्षण से जागृत की जा सकती है। वर्ष 1985 में जब मैने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में वकालत प्रारम्भ की थी तो आमतौर पर 5 से 10 वर्ष पुराने मामले लंबित थे किन्तु आज वर्ष 2010 में आमतौर पर 20 से 30 वर्ष पुराने मामले लंबित हैं। यानी कि बामुश्किल तमाम लगभग दायरे जितना ही निस्तारण हो पा रहा है। आज यदि किसी प्रकार से न्यायिक व्यवस्था में आयी खामियों को दूर भी कर लिया जाये तो भी विवादों को निर्णीत करने की सभी पुरानी विरोधात्मक पद्धतियां यानी कि न्यायालय विवाचन एवं न्यायाधिकरण अब और अधिक बोझ नहीं उठा सकती हंै। संभवत: इन्हीं सब परिस्थितियों एवं विचारों के ताने बाने में आज एक नयी सकारात्मक पद्धति न्यायिक व्यवस्था में जन्म ले चुकी है तथा वह है मध्यस्थता (मीडिएशन)। मध्यस्थता, मोल-तोल की एक ऐसी पद्धति है जहां एक तीसरे निष्पक्ष व्यक्ति द्वारा संवाद स्थापित कराया जाता है जो कि पक्षकारों को उनके दीर्घकालीन हित अहित की पहचान करने विकल्पों की तलाश करने एवं समझौते तक पहंुचने में सहायता करता है। मध्यस्थता की प्रक्रिया द्वारा विवादों को सुलझाने का सार्थक प्रयास लगभग पिछले 15-16 वर्षो से व्यक्तिगत स्तर पर हो रहा था इसे गति देने का श्रेय, सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति सत्यव्रत सिन्हा एवं न्यायमूर्ति मार्कण्डेय काटजू को जाता है। श्री काटजू के अथक प्रयासों से वर्ष 2006 में सर्वप्रथम भारत के तीन उच्च न्यायालयों मद्रास, दिल्ली तथा इलाहाबाद में मध्यस्थता केन्द्र (मीडिएशन सेंटर) न केवल खुले वरन आज एक अच्छे स्वरूप में कार्य कर रहे हैं। वर्ष 2002 में व्यवहार प्रक्रिया संहिता (सिविल प्रोसीजर कोड) की धारा 89 (1) के द्वारा मान्यता प्राप्त यह व्यवस्था हालांकि अभी अपने शैशव काल में है किन्तु मध्यस्थता के लिए संदर्भित विवादों का बोझ कम होने के कारण फिलहाल यह बेहतर ढंग से कार्य कर पा रही है। सभी उच्च न्यायालयों में तथा कुछ जिला न्यायालयों में मध्यस्थता केन्द्र खुल चुके हैं तथा अगले दो-तीन वर्षो में भारत के सभी जिला न्यायालयों में भी इनको खोलने का प्रयास जारी है। जिस प्रकार से चिकित्सा के क्षेत्र में शल्य क्रिया द्वारा आमतौर पर कई प्रकार के रोगों का, हमेशा के लिए अंत कर दिया जाता है उसी प्रकार मध्यस्थता द्वारा समझौता करवा कर समस्त विवादों का निस्तारण आमतौर पर एक बार में ही हमेशा के लिए कर दिया जाता है। इसमें ना तो न्यायाधीश द्वारा बेईमानी का निर्णय देने का जोखिम है तथा ना ही लगभग अंतहीन प्रक्रिया का दोष है। सौदाकारी करके मोलतोल से स्व-निर्णय के अंत पर दोनों ही पक्षों को जीत का अहसास दिलाने वाली मध्यस्थता की यह प्रक्रिया उन विवादों में अधिक सार्थक एवं कारगर सिद्ध हो रही हैं जहां कि दोनों विवाद ग्रस्त पक्षों में किसी प्रकार का कोई संबंध जुड़ा हुआ है। आज मध्यस्थता की पद्धति को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा बनायी गयी मीडिएशन कमेटी के अध्यक्ष माननीय न्यायमूर्ति श्री राजा वर्दराजुल रवीन्द्रन की है। उनका कहना है कि इस पद्धति का अदालती व्यवस्था से कोई विरोध नहीं है बल्कि देखना यह है कि किसी प्रकार के विवाद के लिए कौन सी पद्धति अधिक उपयोगी है। यह कुछ उसी प्रकार से है जैसे की असाध्य रोगों से ग्रस्त व्यक्ति को उपयुक्त अस्पताल में ही भर्ती कराया जाता है।