  | रणदीप सिंह सुरजेवाला, वरिष्ठ अधिवक्ता एवं जनस्वास्थ्य एवं अभियांत्रिकी मंत्री, हरियाणा |
कानून और नैतिकता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। संविधान के तीनों भागों में न्यायपालिका के सबसे अधिक सम्मान का भी यही कारण है। पर मुझे यह देखकर दु:ख होता है कि कई मामलों में न्यायपालिका ने नैतिक नेतृत्व क्षमता खो दी है। इस नैतिक श्रेष्ठता में विश्वास रखने वाले हर व्यक्ति को आघात पहुंचा जब भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जेकेजी बालाकृष्णन ने आरंभिक दावा किया कि 7 जुलाई, 1997 को सर्वोच्च न्यायालय के सर्वसम्मत प्रस्ताव के बावजूद वरिष्ठ न्यायाधीशों को अपनी संपत्तियों का ब्यौरा देने की आवश्यकता नहीं है जब तक कानून द्वारा ऐसा करना बाध्यकारी नहीं हो, चूंकि प्रस्ताव केवल नैतिकता पर आधारित है। बाद में देश की सुप्रीम कोर्ट ने पहले हाईकोर्ट में तथा इसके पश्चात स्वयं सुप्रीम कोर्ट में सूचना का अधिकार अधिनियम को सुप्रीम कोर्ट पर लागू करने की उपयुक्तता को न्यायपालिका में चुनौती दे डाली। इस संदर्भ में उच्च न्यायपालिका के बारे में सार्वजनिक रूप से की गई तथा निजी रूप से सुनी गई टिप्पणियों से मुझे दु:ख हुआ है। यह मानना कि केवल कानून ही, न कि नैतिकता, न्यायपालिका के लिए सर्वोच्च है, न्यायपालिका की परंपरा के विरुद्ध है तथा यह तथ्य व्याकुल करने वाला भी है। यह जे. जोवेल्स के विवेकपूर्ण कथन की उपेक्षा करती है कि कानून को संस्थागत नैतिकता के रूप में देखा जाता है। जब आम नागरिक और वकील न्यायाधीशों की कार्यप्रणाली के विरूद्ध शिकायतें करते हैं, तो इसका कारण यह है कि वे हमारे लोकतंत्र के इस महत्वपूर्ण संस्थान को सुरक्षित रखना चाहते हैं। नाम लिए बगैर ही, मैं यह बताना चाहता हूं कि हाल की कुछ घटनाएं भयावह रही हैं। हाईकोर्टो के न्यायाधीशों के खिलाफ दो महाभियोग प्रस्ताव लाए गए उनमें से एक न्यायाधीश तो सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त किए जाने वाले थे। जो संसद के समक्ष लंबित है। प्राविडेंट फंड केस में सुप्रीम कोर्ट को प्रस्तुत की गई स्थिति रिपोर्ट में सीबीआई ने 24 न्यायाधीशों को लिप्त पाया है। इनमें सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश और कुछ हाईकोर्टो के न्यायाधीश भी शामिल हैं जिन पर आर्थिक लाभ लेने के आरोप लगे हैं। विभिन्न हाई कोर्टो द्वारा न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए सिफारिश किए गए कुछ नामों ने नामित व्यक्तियों की काबलियत व सत्यनिष्ठा पर सवाल खडे़ किए हैं। इसी प्रकार, कुछ स्थानांतरणों के मामलों पर भी आम जनता में सवाल खडे़ हुए हैं। जागरूक नागरिक यह पूछ रहे हैं-यह सब क्या हो रहा है? कालेजियम के निर्णय यह हैं? सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्टो तक उन्नत किए जाने के लिए कौन से मापदंड अपनाए जा रहे हैं? कई हाईकोर्टो में न्यायाधीशों के पद खाली क्यों पडे़ हैं? न्यायाधीशों के खिलाफ जांच और महाभियोग सालों साल लटकते रहते हैं और साथ ही वे अपने पद पर भी कार्य करते रहते हैं। मैं समझता हूं कि सरकारों और न्यायपालिका के सर्वोच्च पदाधिकारियों को इस प्रकार की त्रुटियों को गंभीरता से लाना चाहिए। हमें यह नहीं भूलना है कि सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों ने अपनी संपत्तियों के ब्यौरे देने की बात तब मानी जब इस पर जनता में काफी बहस हुई। कई हाईकोर्टो ने भी अब इसका अनुपालन किया है। न्यायालयों की अलग-अलग वेबसाइटों पर न्यायाधीशों की संपत्तियों के बारे में जानकारी त्वरित उपलब्ध रहनी चाहिए। हालांकि, यह स्वैच्छिक है लेकिन इससे जनता के मन में लोकतांत्रिक संस्थाओं में सर्वाधिक सम्माननीय संस्था अर्थात न्यायपालिका में विश्वास सुदृढ़ होगा। मैं यह निवेदन करना चाहता हूं कि सूचना का अधिकार अधिनियम सोनिया गांधी की व्यक्तिगत निष्ठा के प्रयासों के फलस्वरूप यूपीए सरकार के पिछले कार्यकाल में अस्तित्व में आया और इसी से आर्थिक रूप से यह पारदर्शिता सुनिश्चित हो सकी है। जब मैं यह कहता हूं कि इस क्रांतिकारी कानून को पारित करने में न्यायपालिका की ओर से भी कुछ दिक्कतें थीं तो इस अपराध के लिए आप मुझे क्षमा करेंगे। दिल्ली उच्च न्यायालय के इस निर्णय को मैं सलाम किए बिना नहीं रह सकता जिसमें कहा गया है कि न्यायपालिका भी सूचना का अधिकार अधिनियम के दायरे में है। क्रमश: |