  | केएस राठौर, असिस्टेंट प्रोफेसर, यूनिटी लॉ कालेज |
जहां तक न्यायपालिका का प्रश्न है लोगों के मौलिक अधिकारों का संरक्षक होने के कारण यदि कभी इस संस्था की विकृतियां. चाहें वे जिस रूप में भी हों, जनता के समक्ष उजागर होती हैं तो आम नागरिक का आश्चर्यचकित होना स्वभाविक है। इसी कारण सरकार व आम जनमानस न्यायिक सुधारों की बात कर रहा है इसके लिए हमें सरकार के बुनियादी व ढांचागत व्यवस्था पर भी दृष्टिपात करना होगा। जैसे-जहां हम एक अरब से अधिक की जनसंख्या के आंकड़े को लिए हुए हैं उन्हें न्याय दिलाने के लिए क्या हमारे पास अधीनस्थ न्यायालयों से लेकर सर्वाेच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की पर्याप्तता है? क्या जो कानून विधायिका द्वारा बनाये जा रहे हैं वे योग्य एवं कुशल व्यक्तियों द्वारा बनाये जा रहे हैं? क्या प्रशासनिक प्राधिकारियों द्वारा अपने कर्तव्य बोध का सही रूप से पालन किया जा रहा? इन सभी प्रश्नों का कहीं न कहीं न्यायिक सुधारों एवं न्यायपालिका से गहरा संबंध है। दोषपूर्ण कानूनी शिक्षा व्यवस्था, भ्रष्टाचार, क्षेत्रवाद, भाई-भतीजावाद एवं जातिवाद ने इस न्यायिक व्यवस्था की छवि धूमिल की है। सरकार को चाहिए कि वह पेंडेसी घटाने के लिए प्रत्येक राज्य में हाईकोर्ट की स्थापना का प्रावधान करें। ग्राम न्यायालय अधिनियम को यदि प्रत्येक राज्य ईमानदारी से लागू करे तो इस दिशा में वांछित सफलता मिल सकती है। छोटे-छोटे मामलों का न्याय निर्णयन का अधिकार ग्राम पंचायतों को दिया जा सकता है। ऑनर किलिंग जैसे जघन्य व बर्बर कार्याे में संलिप्त लोगों को दंडित करने की भी आवश्यकता महसूस की जा रही है। लोक अदालतों, विधिक गोष्ठियों, अर्द्ध न्यायिक संस्थाओं को प्रोत्साहित कर उन्हें अधिकार संपन्न बनाकर न्यायिक कार्याे में लगाने की जरूरत है। न्याय पालिका द्वारा भी न्यायिक सुधारों के लिए तथा न्याय को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने के लिए अनेक प्रयास किये हैं लेकिन इस दिशा में अपेक्षित सफलता नहीं मिली। हुस्नआरा खातून बनाम स्टेट ऑफ बिहार के मामले में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि शीघ्र सस्ता तथा नि:शुल्क विधिक सहायता प्राप्त करना प्रत्येक नागरिक का अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार है। मोजेज विल्सन बनाम कस्तूरबा के मामले में उच्चतम न्यायालय ने शीघ्र परीक्षण न किये जाने पर गहरी चिंता व्यक्त की।
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