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सुलझेगा केस बढ़ेगा निवेश
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संजीव के कुमार, पार्टनर, खेतान एंड कंपनी

पिछले दो दशकों के दौरान वैश्वीकरण, औद्योगिकीकरण, उदारीकरण और निजीकरण के चलते भारतीय अर्थव्यवस्था का चहुंमुखी विकास हुआ। अर्थव्यवस्था, वाणिज्य और कारोबार में हुए इस विकास से वाणिज्यिक लेनदेन के विवादों में भी बढ़ोतरी हुई। देश के न्यायिक अधिकार क्षेत्र के तहत जिस गति से इन विवादों का निपटारा किया जाता है, भावी निवेशकों द्वारा निवेश की मंजिल चुनने के समय प्रतिस्पर्धी न्यायिक अधिकार क्षेत्रों वाला यह कारक कहीं न कहीं उनके मूल्यांकन का आधार बनता है। इसलिए इन विवादों के त्वरित निपटारे वाली प्रणाली की व्यवस्था होनी चाहिए जिससे देश में निवेश माहौल को बनाने   में मदद मिले। गौरतलब है कि आने वाले दिनों में महाशक्ति बनने जा रहे हमारे देश में आज कोई भी ऐसी विशिष्ट अदालत नहीं है, जहां बड़े वाणिज्यिक विवादों का निपटारा किया जा सके।
दुनिया के कई देशों में ऐसी वाणिज्यिक अदालतों का गठन किया गया है, जो केवल वाणिज्यिक विवादों के मामलों में फैसला देने के प्रति समर्पित हैं। वाणिज्यिक अदालतों की स्थापना सबसे पहले इंग्लैंड में की गई। साल 1892 में काउंसिल आफ जजेज के एक प्रस्ताव द्वारा लंदन में कारोबारियों और व्यापारियों के सामान्य लेनदेन के विवादों के निपटारे के लिए इसका गठन किया गया। वाणिज्यिक अदालत की स्थापना सफलतम और चिरस्थाई न्यायिक अनुभवों में से एक था। अंतरराष्ट्रीय समुदाय और लंदन के कारोबारियों के अत्यधिक लाभ के लिए इस अदालत को सरकारी कानून या सहायता के बिना लागू किया गया। शीघ्र ही अदालतों का यह मॉडल अमेरिका सहित दूसरे देशों में भी अपनाया गया।
अपने देश की आर्थिक नीतियों में व्यापक बदलाव के बाद यह चिंता जोर पकड़ रही है कि यहां भी वाणिज्यिक विवादों के त्वरित निपटारे के लिए समर्पित वाणिज्यिक अदालतों का गठन किया जाए। इस चिंता का संज्ञान लेते हुए और अमेरिका एवं ब्रिटेन की वाणिज्यिक अदालतों में भारतीय प्रतिवादियों के खिलाफ दर्ज मामलों की संख्या में तेज बढ़ोतरी के मद्देनजर  भारतीय विधि आयोग ने साल 2003 में अपनी 188वीं रिपोर्ट में देश के उच्च न्यायालयों में हाई-टेक फास्ट ट्रैक वाणिज्यिक प्रभाग के गठन की सिफारिश की है। गौरतलब है कि अमेरिका और ब्रिटेन में भारतीय प्रतिवादियों के ऊपर भले ही कार्रवाई का कोई कारण न हो लेकिन किसी भारतीय प्रतिवादी की कोई शाखा या उस देश में स्थानीय प्रतिनिधित्व या फिर उस देश के शेयर बाजार में प्रतिवादी द्वारा कारोबार करने से वाणिज्यिक विवादों के पैदा होने पर उसी देश की अदालतों में निपटारे की व्यवस्था है। आयोग की यह सिफारिश इस लाभ के मद्देनजर थी कि इससे देश में निवेश बढ़ने का मार्ग प्रशस्त होगा और घरेलू एवं विदेशी निवेशकों को ऐसे मामलों के निपटारे में लागत कम आएगी।
इसके चलते दिसबंर 2009 में द कमर्शियल डिवीजन आफ हाईको‌र्ट्स बिल 2009 को लोकसभा में पेश किया गया। 18 दिसंबर 2009 को लोकसभा में पारित होने के उपरांत यह बिल राज्यसभा में लंबित है। इस बिल में प्रावधान किया गया है कि पांच करोड़ रुपये से अधिक  मूल्य वाले सभी वाणिज्यिक विवादों की सुनवाई के लिए देश के सभी उच्च न्यायालयों में वाणिज्यिक प्रभाग बनाए जाएं। इस बिल में बताया गया है कि सभी उच्च न्यायालयों के मूल न्यायिक अधिकार क्षेत्र  के अनुसार ही प्रत्येक राज्य की वाणिज्यिक याचिका का केंद्र तय किया जाएगा। यानी उच्च न्यायालयों का न्यायिक अधिकार क्षेत्र वाणिज्यिक मामलों पर भी लागू होगा। वाणिज्यिक मुकदमों की सुनवाई में होने वाली देरी और इसका त्वरित निस्तारण ही इस बिल का उद्देश्य है। किसी मुकदमे की सुनाई के करीब हर चरण के लिए इस बिल में समयबद्धता का प्रावधान किया गया है। इस नए कानून में अदालत के समन को इलेक्ट्रानिक मेल के द्वारा भी भेजे जाने का प्रावधान किया गया है। सुनवाई पूरी होने के बाद इस वाणिज्यिक प्रभाग को अधिकतम 30 दिन के अंदर ही फैसला सुनाना होगा। बिल में इसके वाणिज्यिक प्रभाग के फैसले को चुनौती देने के लिए भी सीमा तय की गई है। इसके अनुसार इन फैसलों पर केवल एक बार ही अपील की जा सकेगी। वाणिज्यिक प्रभाग द्वारा दी गई सभी डिक्रीज की केवल और केवल सुप्रीम कोर्ट में अपील की सकती है।
वाणिज्यिक अदालतों के गठन के प्रस्ताव को विभेदकारी और पक्षपातपूर्ण कहकर इसका विरोध भी किया गया। इन अदालतों के बारे में कहा गया कि यह केवल अमीर और समृद्ध लोगों के  लिए हैं र इससे मुकदमों का धन आधारित वर्गीकरण होगा। बहरहाल इसमें कोई दो राय नहीं है कि इन अदालतों के गठन से वाणिज्यिक मामलों का तेजी से निपटारा किया जा सकेगा जिससे कारोबार करने के लिए देश में कानूनी माहौल सुधरेगा। इससे उच्च कीमत वाले वाणिज्यिक विवादों के त्वरित और प्रभावकारी समाधान से भारतीय और विदेशी निवेशकों में आत्मविश्वास का स्तर ऊंचा होगा। इसलिए व्यापक जनहित में यही उचित है कि वाणिज्यिक अदालतों का गठन करके वाणिज्यिक मामलों का त्वरित निपटारा किया जाए। इससे नि: संदेह आर्थिक शक्ति के रूप में उभर रहे
और विश्वसनीय निवेश स्थल की छवि में वृद्धि होगी। जिसके परिणामस्वरूप कारोबारी निवेश में उत्तरोत्तर विकास को गति मिलेगी, इसके अतिरिक्त लाभ     भी होंगे।

 

   
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